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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  5.33.121 
य आत्मनापत्रपते भृशं नर:
स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत।
अनन्ततेजा: सुमना: समाहित:
स तेजसा सूर्य इवावभासते॥ १२१॥
 
 
अनुवाद
जो स्वयं अत्यंत विनम्र है, वही सब लोगों में श्रेष्ठ माना जाता है। वह अपने अनन्त तेज, शुद्ध हृदय और एकाग्रता के कारण सूर्य के समान चमकता है॥121॥
 
He who is himself very modest is considered to be the best among all people. Due to his infinite brilliance, pure heart and concentration, he shines like the Sun.॥ 121॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)