श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 32: अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  5.32.d1 
वैशम्पायन उवाच
(धर्मराजस्य तु वच: श्रुत्वा पार्थो धनंजय:।
उवाच संजयं तत्र वासुदेवस्य शृण्वत:॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिर की बातें सुनकर कुंतीपुत्र अर्जुन ने वहां भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति में संजय से यह बात कही।
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Hearing the words of Dharmaraja Yudhishthir, Kunti's son Arjun said this to Sanjay there in the presence of Lord Krishna.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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