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श्लोक 5.32.4  |
जागर्ति चेदभिवदेस्त्वं हि द्वा:स्थ
प्रविशेयं विदितो भूमिपस्य।
निवेद्यमत्रात्ययिकं हि मेऽस्ति
द्वा:स्थोऽथ श्रुत्वा नृपतिं जगाम॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| द्वारपाल! यदि महाराज जाग रहे हों, तो उन्हें मेरा प्रणाम कहना। उनकी सूचना पाकर मैं भीतर जाऊँगा। मुझे उनसे एक आवश्यक निवेदन करना है।' यह सुनकर द्वारपाल महाराज के पास गया और इस प्रकार बोला॥4॥ |
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| Gatekeeper! If Maharaj is awake, then convey my regards to him. After getting his information, I will enter inside. I have to make an important request to him.' Hearing this, the gatekeeper went to Maharaj and spoke thus.॥ 4॥ |
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