श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 32: अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  5.32.29 
त्वमेवैको जातु पुत्रस्य राजन्
वशं गत्वा सर्वलोके नरेन्द्र।
कामात्मन: श्लाघनो द्यूतकाले
नागा: शमं पश्य विपाकमस्य॥ २९॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! महाराज! सम्पूर्ण लोक में आपने ही अपने स्वेच्छाचारी पुत्र की प्रशंसा की और उसके अधीन होकर द्यूतक्रीड़ा के समय उसकी स्तुति की और (राज्य का लोभ त्यागकर) शान्त न हुए। अब आप अपनी आँखों से उसका यह भयंकर परिणाम देखिये॥29॥
 
O King! Maharaj! In the entire world you alone praised your willful son and became subservient to him and praised him during the game of dice and could not calm down (after giving up the greed for the kingdom). Now see with your own eyes this dreadful result of that. ॥ 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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