श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 32: अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  5.32.26 
न त्वेव मन्ये पुरुषस्य कर्म
संवर्तते सुप्रयुक्तं यथावत्।
मातु: पितु: कर्मणाभिप्रसूत:
संवर्धते विधिवद् भोजनेन॥ २६॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहा जाता है कि केवल उचित रीति से किया गया प्रयत्न ही उत्तम फल देता है, जैसे माता-पिता के प्रयत्न से उत्पन्न पुत्र उचित आहार पाकर बढ़ता है; परन्तु मैं इस मान्यता को नहीं मानता (क्योंकि इस विषय में तो भगवान ही सर्वोपरि हैं)।॥26॥
 
It is said that mere effort, when put in the right manner, yields excellent results, just as a son born through the efforts of his parents grows by being fed properly; but I do not believe in this belief (because in this matter only God is paramount).॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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