श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 32: अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  5.32.23 
किमन्यत्र विषयादीश्वराणां
यत्र पार्थ: परलोकं स्म द्रष्टुम्।
अत्यक्रामत् स तथा सम्मत: स्या-
न्न संशयो नास्ति मनुष्यकार:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
वह कौन सी वस्तु है जो लोकपालों (जगत के रक्षकों) के अधिकार से बाहर है? इसीलिए अर्जुन (इन्द्रकील पर्वत पर लोकपालों से मिलकर उनसे अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करके, पृथ्वी और भुवर्लोक को पार करके) स्वर्ग देखने गए। यदि लोकपालों द्वारा इस प्रकार सम्मानित होने पर भी उन्हें दुःख भोगना पड़े, तो निःसंदेह कहा जा सकता है कि ईश्वरीय शक्ति के सामने मनुष्य का पुरुषार्थ कुछ भी नहीं है॥23॥
 
What is that thing which is beyond the authority of the Lokpalas (guardians of the world)? That is why Arjuna (after meeting the Lokpalas on the Indrakeel mountain and getting weapons from them, crossed the earth and the Bhuvarloka) went to see the heaven. If he has to suffer in spite of being honoured by the Lokpalas in this manner, then it can be said without any doubt that man's efforts are nothing in front of the divine power.॥23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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