श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 32: अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  5.32.19 
कुले जातो बलवान‍् यो यशस्वी
बहुश्रुत: सुखजीवी यतात्मा।
धर्माधर्मौ ग्रथितौ यो बिभर्ति
स ह्यस्य दिष्टस्य वशादुपैति॥ १९॥
 
 
अनुवाद
जो श्रेष्ठ, बलवान, यशस्वी, ज्ञानी, ज्ञानी, सुखी और मन को वश में रखने वाला है तथा जो धर्म-अधर्म के समन्वय में स्थित रहता है, वही भाग्य से इच्छित गुणों को प्राप्त करता है ॥19॥
 
The one who is noble, strong, famous, knowledgeable, knowledgeable, happy and has control over the mind and who adheres to the intertwining of righteousness and unrighteousness, only he by luck attains the desired qualities. 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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