श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 32: अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.32.12 
परो धर्मात् पाण्डवस्यानृशंस्यं
धर्म: परो वित्तचयान्मतोऽस्य।
सुखप्रिये धर्महीनेऽनपार्थेऽ-
नुरुध्यते भारत तस्य बुद्धि:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
भारत पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर की दृष्टि में अन्य धर्मों की अपेक्षा दया ही परम धर्म है। वे धन संचय की अपेक्षा धर्म का पालन करना श्रेष्ठ समझते हैं। उनकी बुद्धि धर्मरहित तथा उद्देश्यहीन भोगों और प्रिय वस्तुओं की ओर नहीं जाती। 12॥
 
India In the eyes of Pandunandan Yudhishthira, compassion is the ultimate religion compared to other religions. They consider following religion as better than accumulating wealth. Their intellect does not pursue religionless and purposeless pleasures and beloved things. 12॥
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