श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 29: संजयकी बातोंका प्रत्युत्तर देते हुए श्रीकृष्णका उसे धृतराष्ट्रके लिये चेतावनी देना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.29.34 
सोऽयं लोभान्मन्यते धर्ममेतं
यमिच्छति क्रोधवशानुगामी।
भाग: पुन: पाण्डवानां निविष्ट-
स्तं न: कस्मादाददीरन् परे वै॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
दुर्योधन क्रोधवश ही कार्य करने वाला है और लोभवश राज्य छीनना चाहता है। वह इसे धर्म समझ रहा है; परन्तु यह पाण्डवों का भाग है, जो कौरवों के पास जमानत के रूप में रखा हुआ है। संजय! हमारे शत्रु कौरव हमारा वह भाग कैसे छीन सकते हैं?॥ 34॥
 
Duryodhan is going to act according to his anger and he wants to take the kingdom out of greed. He is considering it as Dharma; but it is the share of the Pandavas, which is kept as a deposit with the Kauravas. Sanjay! How can the Kauravas, who are our enemies, take away that share of ours?॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)