श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 26: युधिष्ठिरका संजयको इन्द्रप्रस्थ लौटानेसे ही शान्ति होना सम्भव बतलाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.26.2 
अकुर्वतश्चेत् पुरुषस्य संजय
सिद्धॺेत् संकल्पो मनसा यं यमिच्छेत्।
न कर्म कुर्याद् विदितं ममैत-
दन्यत्र युद्धाद् बहु यल्लघीय:॥ २॥
 
 
अनुवाद
संजय! यदि बिना कर्म किए भी मनुष्य की इच्छाएँ पूरी हो सकतीं, यदि उसे मन की इच्छा पूरी हो जाती, तो कोई भी मनुष्य कर्म न करता, यह मैं भली-भाँति जानता हूँ। यदि बिना युद्ध किए भी थोड़ा-सा भी लाभ प्राप्त हो जाए, तो उसे बहुत बड़ी बात समझनी चाहिए॥ 2॥
 
Sanjay! If a man's wishes could be fulfilled even without doing any work, if he could get whatever he wanted in his mind, then no man would do any work, I know this very well. If even a little benefit is gained without fighting a war, then it should be considered as a great thing.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)