श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 26: युधिष्ठिरका संजयको इन्द्रप्रस्थ लौटानेसे ही शान्ति होना सम्भव बतलाना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.26.12 
अनाप्तवच्चाप्ततमस्य वाच:
सुयोधनो विदुरस्यावमत्य।
सुतस्य राजा धृतराष्ट्र: प्रियैषी
सम्बुध्यमानो विशतेऽधर्ममेव॥ १२॥
 
 
अनुवाद
राजा धृतराष्ट्र, जो अपने पुत्र दुर्योधन से बहुत प्रेम करते हैं, अपने परम विश्वासपात्र विदुर जी की बातों की अवहेलना करके उन्हें अविश्वसनीय मानते हैं और जान-बूझकर अन्याय का मार्ग अपना रहे हैं ॥12॥
 
King Dhritarashtra, who loves his son Duryodhana very much, disregards the words of his most trusted person Vidur ji and considers them unreliable and is deliberately taking the path of injustice. ॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)