श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 22: धृतराष्ट्रका संजयसे पाण्डवोंके प्रभाव और प्रतिभाका वर्णन करते हुए उसे संदेश देकर पाण्डवोंके पास भेजना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.22.8 
उत्थानवीर्य: सुखमेधमानो
दुर्योधन: सुकृतं मन्यते तत्।
तेषां भागं यच्च मन्येत बाल:
शक्यं हर्तुं जीवतां पाण्डवानाम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
दुर्योधन अपनी वीरता आरंभ में ही दिखाने वाला है, (वह उसे अंत तक कायम नहीं रख सकता;) क्योंकि उसका पालन-पोषण सुख-सुविधाओं में हुआ है। वह इतना मूर्ख है कि पांडवों के जीवित रहते ही उनका भाग छीन लेना उसे आसान लगता है। इतना ही नहीं, वह इस पाप कर्म को भी पुण्य कर्म मानने लगा है। 8.
 
Duryodhan is going to show his valour in the beginning, (he cannot maintain it till the end;) because he has been brought up in comfort. He is so foolish that he thinks it is easy to snatch away the share of the Pandavas while they are still alive. Not only this, he has started considering this evil deed as a good deed. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)