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श्लोक 5.2.15  |
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवत्येव मधुप्रवीरे
शिनिप्रवीर: सहसोत्पपात।
तच्चापि वाक्यं परिनिन्द्य तस्य
समाददे वाक्यमिदं समन्यु:॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! मधुवंश के प्रधान योद्धा बलदेव इस प्रकार बोल रहे थे कि अचानक शिनिवंश के श्रेष्ठ योद्धा सात्यकि उछलकर खड़े हो गए। वे क्रोधित होकर बलभद्र की वाणी की कठोर निन्दा करने लगे और इस प्रकार कहने लगे॥15॥ |
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| Vaishampayana says - Janamejaya! The chief warrior of Madhuvansh, Baladev was speaking in this manner when suddenly Satyaki, the best warrior of Shinivansh, jumped up and stood up. He became angry and started criticizing Balabhadra's speech in a harsh manner and said thus.॥ 15॥ |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि बलदेववाक्ये द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें बलदेववाक्यविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥ २॥
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