श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 187: अम्बाका द्वितीय जन्ममें पुन: तप करना और महादेवजीसे अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उसका चिताकी आगमें प्रवेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.187.3 
वधार्थं तस्य दीक्षा मे न लोकार्थं तपोधना:।
निहत्य भीष्मं गच्छेयं शान्तिमित्येव निश्चय:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे तपस्वियों! मेरी यह तपस्या पुण्यलोक प्राप्ति के लिए नहीं, अपितु भीष्म के वध के लिए है। मुझे विश्वास है कि भीष्म को मारकर मेरे हृदय को शांति मिलेगी।॥3॥
 
‘O ascetics! This initiation of mine into penance is not for attaining the virtuous world, but for killing Bhishma. I am sure that after killing Bhishma, my heart will find peace.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)