श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 187: अम्बाका द्वितीय जन्ममें पुन: तप करना और महादेवजीसे अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उसका चिताकी आगमें प्रवेश  »  श्लोक 17-19
 
 
श्लोक  5.187.17-19 
तत: सा पश्यतां तेषां महर्षीणामनिन्दिता।
समाहृत्य वनात् तस्मात् काष्ठानि वरवर्णिनी॥ १७॥
चितां कृत्वा सुमहतीं प्रदाय च हुताशनम्।
प्रदीप्तेऽग्नौ महाराज रोषदीप्तेन चेतसा॥ १८॥
उक्त्वा भीष्मवधायेति प्रविवेश हुताशनम्।
ज्येष्ठा काशिसुता राजन् यमुनामभितो नदीम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उन महर्षियों के समक्ष उस धर्मपरायण एवं सुन्दरी कन्या ने वन से बहुत-सी लकड़ियाँ एकत्रित कीं और एक विशाल चिता बनाकर उसमें आग लगा दी। महाराज! जब अग्नि प्रज्वलित हो गई, तब क्रोध से जलते हुए हृदय वाली वह कन्या भीष्म को मारने का संकल्प करती हुई अग्नि में प्रविष्ट हो गई। महाराज! इस प्रकार काशीराज की वह ज्येष्ठ पुत्री अम्बा अगले जन्म में यमुना नदी के तट पर चिता की अग्नि में जलकर भस्म हो गई।
 
Thereafter, in front of those great sages, that pious and beautiful girl collected a lot of wood from the forest and made a huge pyre and set it on fire. Maharaj! When the fire was lit, then with her heart burning with anger, she entered the fire, uttering the resolve to kill Bhishma. King! In this way, that eldest daughter of Kashiraj, Amba, was burnt to ashes in the fire of the pyre on the banks of river Yamuna in her next birth.
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि अम्बाहुताशनप्रवेशे सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १८७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें अम्बाका अग्निमें प्रवेशविषयक एक सौ सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)