श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 185: देवताओंके मना करनेसे भीष्मका प्रस्वापनास्त्रको प्रयोगमें न लाना तथा पितर, देवता और गंगाके आग्रहसे भीष्म और परशुरामके युद्धकी समाप्ति  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  5.185.35 
ततोऽहं राममासाद्य ववन्दे भृशविक्षत:।
रामश्चाभ्युत्स्मयन् प्रेम्णा मामुवाच महातपा:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् मैं परशुरामजी के पास गया और उनके चरणों में प्रणाम किया। उस समय मेरा शरीर अत्यन्त घायल हो गया था। महातपस्वी परशुरामजी मुझे देखकर मुस्कुराये और प्रेमपूर्वक इस प्रकार बोले -॥35॥
 
Thereafter I went to Parashurama and bowed down at his feet. At that time my body was very badly injured. The great ascetic Parashurama smiled on seeing me and spoke lovingly thus -॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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