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श्लोक 5.176.9-10h  |
राजपुत्र्या: प्रकृत्या च कुमार्यास्तव भामिनि।
भद्रे दोषा हि विद्यन्ते बहवो वरवर्णिनि॥ ९॥
आश्रमे वै वसन्त्यास्ते न भवेयु: पितुर्गृहे। |
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| अनुवाद |
| भामिनी! एक तो तुम राजकुमारी हो और दूसरे स्वभाव से कोमल, अतः सुन्दर! आश्रम में तुम्हारे रहने से अनेक दोष उत्पन्न हो सकते हैं। वे दोष पिता के घर में नहीं मिलेंगे।'॥9 1/2॥ |
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| ‘Bhamini! Firstly you are a princess and secondly you are naturally delicate, hence beautiful! Many faults can arise from your stay here in the ashram. Those faults will not be found in father's house.'॥9 1/2॥ |
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