श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 176: तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  5.176.9-10h 
राजपुत्र्या: प्रकृत्या च कुमार्यास्तव भामिनि।
भद्रे दोषा हि विद्यन्ते बहवो वरवर्णिनि॥ ९॥
आश्रमे वै वसन्त्यास्ते न भवेयु: पितुर्गृहे।
 
 
अनुवाद
भामिनी! एक तो तुम राजकुमारी हो और दूसरे स्वभाव से कोमल, अतः सुन्दर! आश्रम में तुम्हारे रहने से अनेक दोष उत्पन्न हो सकते हैं। वे दोष पिता के घर में नहीं मिलेंगे।'॥9 1/2॥
 
‘Bhamini! Firstly you are a princess and secondly you are naturally delicate, hence beautiful! Many faults can arise from your stay here in the ashram. Those faults will not be found in father's house.'॥9 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)