श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 176: तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.176.17 
तस्योपविष्टस्य सतो विश्रान्तस्योपशृण्वत:।
पुनरेव कथां चक्रु: कन्यां प्रति वनौकस:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जब वे अपने आसन पर विश्राम कर चुके, तब वनवासी तपस्वियों ने उनके सुनते हुए पुनः उस कन्या के विषय में बातें करनी आरम्भ कर दीं॥17॥
 
When he had finished resting on his seat, the forest-dwelling ascetics, in his hearing, once again began talking about the girl.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)