श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 176: तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.176.14 
यथा परेऽपि मे लोके न स्यादेवं महात्यय:।
दौर्भाग्यं तापसश्रेष्ठास्तस्मात् तप्स्याम्यहं तप:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे महर्षियों! मैं तप करना चाहता हूँ, जिससे मुझे परलोक में ऐसा महान् कष्ट और दुर्भाग्य न झेलना पड़े। अतः मैं अवश्य तप करूँगा॥14॥
 
O great sages! I want to perform penance so that I do not have to face such a great trouble and misfortune in the next world. Therefore, I will definitely perform penance. ॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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