श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 176: तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  5.176.10-11 
ततस्त्वन्येऽब्रुवन् वाक्यं तापसास्तां तपस्विनीम्॥ १०॥
त्वामिहैकाकिनीं दृष्ट्वा निर्जने गहने वने।
प्रार्थयिष्यन्ति राजानस्तस्मान्मैवं मन: कृथा:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् अन्य तपस्वियों ने उस तपस्विनी से कहा, "इस घने और निर्जन वन में तुम्हें अकेली देखकर अनेक राजा तुमसे प्रणय निवेदन करेंगे। इसलिए तुम्हें इस प्रकार तपस्या करने का विचार भी नहीं करना चाहिए।"
 
Thereafter the other ascetics said to the female ascetic, 'Many kings will seek love from you when they see you alone in this dense and deserted forest. Therefore, you should not think of performing penance in this manner.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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