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श्लोक 5.175.d1-d2  |
(अभिनन्दस्व मां राजन् सदा प्रियहिते रताम्।
प्रतिपादय मां राजन् धर्मार्थं चैव धर्मत:॥
त्वं हि मनसा ध्यातस्त्वया चाप्युपमन्त्रिता॥ ) |
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| अनुवाद |
| राजन्! मैं सदैव आपकी प्रिय हूँ और आपकी सहायता के लिए सदैव तत्पर रहती हूँ। मुझे स्वीकार करके मुझे प्रसन्न कीजिए। हे मनुष्यों के स्वामी! मुझे धर्मानुसार स्वीकार कीजिए और धर्म के निमित्त मुझे अपने चरणों में स्थान दीजिए। मैंने सदैव हृदय में आपका ही ध्यान किया है और आपने भी एकांत में मुझसे विवाह का प्रस्ताव रखा था।' |
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| ‘King! I am always your favourite and always ready to help you. Make me happy by accepting me. O Lord of men! Accept me according to Dharma and give me a place at your feet for Dharma's sake. I have always thought of you in my heart and you too had proposed to marry me in private.' |
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