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mahabharat 5.175.34: अतः इस समय मुझे यही उचित प्रतीत होता है कि मैं भीष्म से या तो तपस्या द्वारा या युद्ध द्वारा बदला लूं; क्योंकि वे ही मेरे दुःख के मूल कारण हैं॥34॥   |   mahabharat अध्याय 5.175: अम्बाका शाल्वके यहाँ जाना और उससे परित्यक्त होकर तापसोंके आश्रममें आना, वहाँ शैखावत्य और अम्बाका संवाद   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 175: अम्बाका शाल्वके यहाँ जाना और उससे परित्यक्त होकर तापसोंके आश्रममें आना, वहाँ शैखावत्य और अम्बाका संवाद  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.175.34 
सा भीष्मे प्रतिकर्तव्यमहं पश्यामि साम्प्रतम्।
तपसा वा युधा वापि दु:खहेतु: स मे मत:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
अतः इस समय मुझे यही उचित प्रतीत होता है कि मैं भीष्म से या तो तपस्या द्वारा या युद्ध द्वारा बदला लूं; क्योंकि वे ही मेरे दुःख के मूल कारण हैं॥34॥
 
‘Therefore, at this time it seems appropriate to me to take revenge on Bhishma either through penance or war; because he is the main cause of my suffering.॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)