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श्लोक 5.175.34  |
सा भीष्मे प्रतिकर्तव्यमहं पश्यामि साम्प्रतम्।
तपसा वा युधा वापि दु:खहेतु: स मे मत:॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| अतः इस समय मुझे यही उचित प्रतीत होता है कि मैं भीष्म से या तो तपस्या द्वारा या युद्ध द्वारा बदला लूं; क्योंकि वे ही मेरे दुःख के मूल कारण हैं॥34॥ |
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| ‘Therefore, at this time it seems appropriate to me to take revenge on Bhishma either through penance or war; because he is the main cause of my suffering.॥ 34॥ |
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