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mahabharat 5.175.16: हे पुरुषसिंह शाल्वराज! मैं माथे का स्पर्श करके कहता हूँ; मैं आपके अतिरिक्त किसी अन्य वर का चिन्तन नहीं करता हूँ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 5.175: अम्बाका शाल्वके यहाँ जाना और उससे परित्यक्त होकर तापसोंके आश्रममें आना, वहाँ शैखावत्य और अम्बाका संवाद   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 175: अम्बाका शाल्वके यहाँ जाना और उससे परित्यक्त होकर तापसोंके आश्रममें आना, वहाँ शैखावत्य और अम्बाका संवाद  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.175.16 
यथा शाल्वपते नान्यं वरं ध्यामि कथंचन।
त्वामृते पुरुषव्याघ्र तथा मूर्धानमालभे॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषसिंह शाल्वराज! मैं माथे का स्पर्श करके कहता हूँ; मैं आपके अतिरिक्त किसी अन्य वर का चिन्तन नहीं करता हूँ॥16॥
 
Purushasingh Shalvaraj! I say this by touching my forehead; I do not think of any other groom except you.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)