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mahabharat 5.168.34: हे नीच पुरुष! संतजन अपने बल की प्रशंसा करना कभी अच्छा नहीं समझते, परंतु तुम्हारे आचरण से क्षुब्ध होकर मैं भी अपनी प्रशंसा में कुछ कह रहा हूँ॥34॥   |   mahabharat अध्याय 5.168: कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका वर्णन, कर्ण और भीष्मका रोषपूर्वक संवाद तथा दुर्योधनद्वारा उसका निवारण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 168: कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका वर्णन, कर्ण और भीष्मका रोषपूर्वक संवाद तथा दुर्योधनद्वारा उसका निवारण  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.168.34 
कामं नैतत् प्रशंसन्ति सन्त: स्वबलसंस्तवम्।
वक्ष्यामि तु त्वां संतप्तो निहीनकुलपांसन॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
हे नीच पुरुष! संतजन अपने बल की प्रशंसा करना कभी अच्छा नहीं समझते, परंतु तुम्हारे आचरण से क्षुब्ध होकर मैं भी अपनी प्रशंसा में कुछ कह रहा हूँ॥34॥
 
O lowly person! Saints never consider it good to praise their own strength, but being annoyed with your behavior, I am also saying something in my praise. ॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)