विराटद्रुपदौ वृद्धावुलूकमिदमूचतु:।
दासभावं नियच्छेव साधोरिति मति: सदा।
तौ च दासावदासौ वा पौरुषं यस्य यादृशम्॥ ४१॥
अनुवाद
तत्पश्चात् वृद्ध राजा विराट और द्रुपद ने उलूक से इस प्रकार कहा - 'उलूक ! तुम दुर्योधन से कहो, राजन ! हम दोनों का विचार सदैव यही रहता है कि हमें साधु पुरुषों का दास बनना चाहिए। हम दोनों, विराट और द्रुपद, दास हैं या दासी; इसका निर्णय युद्ध में किए गए पुरुषार्थ को देखकर होगा ॥41॥
Thereafter, old King Virat and Drupada said to Uluka thus – ‘Uluka! You tell Duryodhana, king! The thought of both of us is always that we should become slaves of saintly men. Both of us, Virat and Drupada, are slaves or slaves; This will be decided by looking at the efforts that one makes in the war. 41॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥