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श्लोक 5.161.42  |
शस्त्रौघमक्षय्यमतिप्रवृद्धं
यदावगाह्य श्रमनष्टचेता:।
भविष्यसि त्वं हतसर्वबान्धव-
स्तदा मनस्ते परितापमेष्यति॥ ४२॥ |
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| अनुवाद |
| नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र इस युद्धरूपी समुद्र की जलधाराएँ हैं। यह अक्षय है और बहुत विशाल भी है। जब तुम इसमें प्रवेश करोगे और अत्यधिक परिश्रम के कारण अपनी चेतना खो दोगे, तुम्हारे सभी सम्बन्धी मारे जाएँगे, उस समय तुम्हारा मन बहुत व्यथित होगा॥ 42॥ |
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| ‘Various types of weapons are the water currents of this ocean of war. It is inexhaustible and also very large. When you enter it and lose your consciousness due to excessive exertion, all your relatives will be killed, at that time your mind will be very distressed.॥ 42॥ |
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