श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 161: पाण्डवोंके शिविरमें पहुँचकर उलूकका भरी सभामें दुर्योधनका संदेश सुनाना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  5.161.40 
भीष्मवेगमपर्यन्तं द्रोणग्राहदुरासदम्।
कर्णशल्यझषावर्तं काम्बोजवडवामुखम्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
भीष्म उसका अनन्त वेग हैं, इस युद्धरूपी समुद्र में प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि द्रोणाचार्य व्याधियों का सागर हैं, कर्ण और शल्य मछली और भँवर के समान हैं तथा कम्बोजराज सुदक्षिण उसमें प्रचण्ड अग्नि हैं॥40॥
 
Bhishma is its infinite velocity, it is extremely difficult to enter this ocean of war as Dronacharya is the ocean of prey, Karna and Shalya act like fish and whirlpool and Kambojaraj Sudakshin is the huge fire in it.॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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