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श्लोक 5.161.34  |
एवमेतत् सदा दण्डं क्षत्रिया: क्षत्रिये दधु:।
वेणीं कृत्वा षण्ढवेष: कन्यां नर्तितवानसि॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार क्षत्रिय सदैव अपने प्रतिद्वन्द्वियों को दण्ड देते आये हैं। इसीलिए तुम्हें भी सिर पर जटा रखकर, नपुंसक का वेश धारण करके राजा विराट की पुत्री को नचाना पड़ा।' 34. |
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| ‘In this way, Kshatriyas have always punished their rivals. That is why you too had to wear a braid on your head and wear the disguise of a eunuch and make King Virat's daughter dance. 34. |
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