ब्राह्मे धनुषि चाचार्यं वेदयोरन्तगं द्वयो:।
युधि धुर्यमविक्षोभ्यमनीकचरमच्युतम्॥ १५॥
द्रोणं महाद्युतिं पार्थ जेतुमिच्छसि तन्मृषा।
न हि शुश्रुम वातेन मेरुमुन्मथितं गिरिम्॥ १६॥
अनुवाद
आचार्य द्रोण ब्रह्मवेद और धनुर्वेद दोनों में पारंगत हैं। वे युद्ध का भार वहन करने में समर्थ हैं, अजेय हैं, सेना के मध्य में विचरण करते हैं और युद्धभूमि से कभी पीछे नहीं हटते। पार्थ! उन्हीं महाबली द्रोण को परास्त करने की तुम्हारी इच्छा व्यर्थ का दुस्साहस है। हमने कभी नहीं सुना कि वायु कभी सुमेरु पर्वत को उखाड़ ले गई हो॥ 15-16॥
‘Acharya Drona is an expert in both the Brahmaveda and Dhanurveda. He is capable of bearing the burden of war, is unstoppable, moves in the middle of the army and never retreats from the battlefield. Parth! Your desire to defeat the same mighty Drona is nothing but futile daring. We have never heard of the wind ever uprooting the Sumeru mountain.॥ 15-16॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥