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श्लोक 5.159.14  |
न ह्येव कर्ता पुरुष: कर्मणो: शुभपापयो:।
अस्वतन्त्रो हि पुरुष: कार्यते दारुयन्त्रवत्॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| क्योंकि मनुष्य अपने अच्छे-बुरे कर्मों के फल भोगने में स्वतंत्र कर्ता नहीं है; क्योंकि वह प्रारब्ध के अधीन है, इसलिए उसे कठपुतली की तरह कार्य करना पड़ता है ॥14॥ |
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| Because man is not an independent agent in the process of enjoying the fruits of his good and bad deeds; since he is subject to destiny, he has to act like a puppet. ॥14॥ |
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