श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 157: युधिष्ठिरके द्वारा अपने सेनापतियोंका अभिषेक, यदुवंशियोंसहित बलरामजीका आगमन तथा पाण्डवोंसे विदा लेकर उनका तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  5.157.28-29 
उक्तो मया वासुदेव: पुन: पुनरुपह्वरे।
सम्बन्धिषु समां वृत्तिं वर्तस्व मधुसूदन॥ २८॥
पाण्डवा हि यथास्माकं तथा दुर्योधनो नृप:।
तस्यापि क्रियतां साह्यं स पर्येति पुन: पुन:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
मैंने श्रीकृष्ण से एकान्त में बार-बार कहा था कि मधुसूदन! अपने सब सम्बन्धियों के साथ समान व्यवहार करो; क्योंकि हमारे लिए राजा दुर्योधन पाण्डवों के समान है। उसकी भी सहायता करो। वह तुम्हारे यहाँ बार-बार आता रहता है।॥ 28-29॥
 
‘I had repeatedly told Sri Krishna in private that Madhusudan! Behave equally towards all your relatives; because for us, King Duryodhan is like the Pandavas. Help him too. He keeps visiting your place again and again.॥ 28-29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)