वैशम्पायन उवाच
ततो द्रुपदमानाय्य विराटं शिनिपुङ्गवम्।
धृष्टद्युम्नं च पाञ्चाल्यं धृष्टकेतुं च पार्थिव॥ ११॥
शिखण्डिनं च पाञ्चाल्यं सहदेवं च मागधम्।
एतान् सप्त महाभागान् वीरान् युद्धाभिकाङ्क्षिण:॥ १२॥
सेनाप्रणेतॄन् विधिवदभ्यषिञ्चद् युधिष्ठिर:।
सर्वसेनापतिं चात्र धृष्टद्युम्नं चकार ह॥ १३॥
द्रोणान्तहेतोरुत्पन्नो य इद्धाज्जातवेदस:।
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इसके बाद राजा द्रुपद, विराट, सात्यकि, पांचाल राजकुमार धृष्टद्युम्न, धृष्टकेतु, पांचालवीर शिखंडी और मगध राजा सहदेव - इन सात युद्धप्रिय महाभाग वीरों को युधिष्ठिर ने विधिवत सेनापति पद पर अभिषिक्त किया और धृष्टद्युम्न को संपूर्ण सेनाओं का प्रधान सेनापति बनाया, जो द्रोणाचार्य को नष्ट करने के लिए प्रज्वलित अग्नि से उत्पन्न हुए थे। 11—13 1/2॥
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, King Drupada, Virat, Satyaki, Panchal prince Dhrishtadyumna, Dhrishtaketu, Panchalveer Shikhandi and Magadha king Sahadeva - these seven war-loving Mahabhaga heroes, Yudhishthira formally anointed them to the post of commander and made Dhrishtadyumna the chief commander of the entire armies, who were born from the fire that was lit to destroy Dronacharya. 11—13 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥