श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 156: दुर्योधनके द्वारा भीष्मजीका प्रधान सेनापतिके पदपर अभिषेक और कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर शिविर-निर्माण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.156.2 
ऋते सेनाप्रणेतारं पृतना सुमहत्यपि।
दीर्यते युद्धमासाद्य पिपीलिकपुटं यथा॥ २॥
 
 
अनुवाद
दादाजी! सेना चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, योग्य सेनापति के बिना वह युद्ध में चींटियों की कतार की तरह बिखर जाती है।
 
Grandfather! No matter how big an army is, without a capable commander it gets scattered like a line of ants in a war.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)