श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 154: युधिष्ठिरका भगवान‍् श्रीकृष्णसे अपने समयोचित कर्तव्यके विषयमें पूछना, भगवान‍्का युद्धको ही कर्तव्य बताना तथा इस विषयमें युधिष्ठिरका संताप और अर्जुनद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका समर्थन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.154.3 
दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुने: सौबलस्य च।
वासुदेव मतज्ञोऽसि मम सभ्रातृकस्य च॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वासुदेव! आप दुर्योधन, कर्ण, शकुनि तथा मेरे भाइयों के साथ-साथ मेरे भी विचार जानते हैं॥3॥
 
Vasudev! You know the thoughts of Duryodhan, Karna, Shakuni and my brothers as well as mine.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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