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श्लोक 5.154.27  |
ततस्ते धृतसंकल्पा युद्धाय सहसैनिका:।
पाण्डवेया महाराज तां रात्रिं सुखमावसन्॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| महाराज जनमेजय! तत्पश्चात् युद्ध करने का दृढ़ निश्चय करके पाण्डव अपने योद्धाओं सहित उस रात्रि को वहाँ सुखपूर्वक ठहरे॥ 27॥ |
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| Maharaja Janamejaya! Thereafter the Pandavas along with their warriors, having firmly resolved to fight, stayed there comfortably that night.॥ 27॥ |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि युधिष्ठिरार्जुनसंवादे चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें युधिष्ठिर-अर्जुन-संवादविषयक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५४॥
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