श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 154: युधिष्ठिरका भगवान‍् श्रीकृष्णसे अपने समयोचित कर्तव्यके विषयमें पूछना, भगवान‍्का युद्धको ही कर्तव्य बताना तथा इस विषयमें युधिष्ठिरका संताप और अर्जुनद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका समर्थन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.154.25 
न च तौ वक्ष्यतोऽधर्ममिति मे नैष्ठिकी मति:।
नापि युक्तं च कौन्तेय निवर्तितुमयुध्यत:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
"मेरा दृढ़ मत है कि वे दोनों कोई अनुचित बात नहीं कहेंगे। हे कुन्तीपुत्र! अब हमारा युद्ध से विरत होना उचित नहीं है।" ॥25॥
 
"I am of the firm opinion that both of them will not say anything unrighteous. O son of Kunti! It is not right for us to retire from the war now." ॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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