श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 154: युधिष्ठिरका भगवान‍् श्रीकृष्णसे अपने समयोचित कर्तव्यके विषयमें पूछना, भगवान‍्का युद्धको ही कर्तव्य बताना तथा इस विषयमें युधिष्ठिरका संताप और अर्जुनद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका समर्थन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  5.154.21 
तस्मिन् यत्न: कृतोऽस्माभि: स नो हीन: प्रयत्नत:।
अकृते तु प्रयत्नेऽस्मानुपावृत्त: कलिर्महान्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि हमने उसे टालने का हर प्रकार से प्रयत्न किया, फिर भी हमारा प्रयत्न उसे टाल न सका और जिस महान् संघर्ष के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया गया था, वह स्वतः ही हम पर आ पड़ा॥ 21॥
 
Although we made every effort to avert it, yet our efforts could not avert it, and the great strife for which no effort was made, automatically fell upon us.॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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