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श्लोक 5.154.2  |
अस्मिन्नभ्यागते काले किं च न: क्षममच्युत।
कथं च वर्तमाना वै स्वधर्मान्न च्यवेमहि॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| अच्युत! इस समय हमें क्या करना उचित है? हमें कैसा आचरण करना चाहिए? जिससे हम अपने धर्म से च्युत न हों॥ 2॥ |
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| ‘Achyuta! What is right for us to do in this present time? How should we behave? So that we do not fall from our Dharma.॥ 2॥ |
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