श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 154: युधिष्ठिरका भगवान‍् श्रीकृष्णसे अपने समयोचित कर्तव्यके विषयमें पूछना, भगवान‍्का युद्धको ही कर्तव्य बताना तथा इस विषयमें युधिष्ठिरका संताप और अर्जुनद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका समर्थन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.154.10 
बन्धमाज्ञापयामास मम चापि सुयोधन:।
न च तं लब्धवान् कामं दुरात्मा पापनिश्चय:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
उस दुष्टात्मा दुर्योधन ने अपने पापमय संकल्प से मुझे बन्दी बनाने की भी आज्ञा दी थी; परन्तु वह अपनी इच्छा पूरी न कर सका॥10॥
 
That evil-souled Duryodhan, with his sinful resolve, had even ordered me to be imprisoned; but he could not carry out his wish.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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