श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 154: युधिष्ठिरका भगवान‍् श्रीकृष्णसे अपने समयोचित कर्तव्यके विषयमें पूछना, भगवान‍्का युद्धको ही कर्तव्य बताना तथा इस विषयमें युधिष्ठिरका संताप और अर्जुनद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका समर्थन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.154.1 
वैशम्पायन उवाच
वासुदेवस्य तद् वाक्यमनुस्मृत्य युधिष्ठिर:।
पुन: पप्रच्छ वार्ष्णेयं कथं मन्दोऽब्रवीदिदम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भगवान श्रीकृष्ण के उपर्युक्त कथन का स्मरण करके युधिष्ठिर ने उनसे पुनः पूछा - 'भगवन्! मन्दबुद्धि दुर्योधन ने ऐसा क्यों कहा?'॥1॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Remembering the above statement of Lord Shri Krishna, Yudhishthir again asked him - 'Lord! Why did the dull-witted Duryodhana say such a thing? 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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