श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 153: दुर्योधनका सेनाको सुसज्जित होने और शिविर-निर्माण करनेके लिये आज्ञा देना तथा सैनिकोंकी रणयात्राके लिये तैयारी  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.153.4 
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महामते।
सम्भ्रमे तुमुले तस्मिन् यदासीत् कुरुजाङ्गले॥ ४॥
 
 
अनुवाद
श्रीमान्, मैं कुरुक्षेत्र के उस भयंकर समारोह में जो कुछ हुआ था, उसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ।॥4॥
 
Sir, I wish to hear in detail everything that happened during that dreadful ceremony of Kurukshetra. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)