श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 147: युधिष्ठिरके पूछनेपर श्रीकृष्णका कौरवसभामें व्यक्त किये हुए भीष्मजीके वचन सुनाना  »  श्लोक 36-38
 
 
श्लोक  5.147.36-38 
एवं तामनुनीयाहं मातरं जनमेव च॥ ३६॥
अयाचं भ्रातृदारेषु तदा व्यासं महामुनिम्।
सह मात्रा महाराज प्रसाद्य तमृषिं तदा॥ ३७॥
अपत्यार्थं महाराज प्रसादं कृतवांश्च स:।
त्रीन् स पुत्रानजनयत् तदा भरतसत्तम॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
महाराज! इस प्रकार अपनी माता आदि को समझाकर मैंने अपनी माता सहित महर्षि व्यास को प्रसन्न किया और उनसे अपने भाइयों की पत्नियों से पुत्र उत्पन्न करने की प्रार्थना की। हे भरतवंशी! महर्षि ने मुझ पर दया करके उन पत्नियों से तीन पुत्र उत्पन्न किए। 36-38।
 
Maharaj! In this way, after persuading my mother and others to be favorable, I, along with my mother, pleased the great sage Vyas and prayed to him to beget sons from my brother's wives. O jewel of the Bharat clan! The great sage showed mercy and begot three sons from those wives. 36-38.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)