श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 144: विदुरकी बात सुनकर युद्धके भावी दुष्परिणामसे व्यथित हुई कुन्तीका बहुत सोच-विचारके बाद कर्णके पास जाना  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  5.144.15-16h 
नाचार्य: कामवान् शिष्यैर्द्रोणो युद्धॺेत जातुचित्॥ १५॥
पाण्डवेषु कथं हार्दं कुर्यान्न च पितामह:।
 
 
अनुवाद
आचार्य द्रोण सदैव हमारा कल्याण चाहते हैं। वे अपने शिष्यों के साथ कभी युद्ध नहीं कर सकते। इसी प्रकार पितामह भीष्म पाण्डवों के प्रति हार्दिक स्नेह क्यों न रखें?॥ 15 1/2॥
 
‘Acharya Drona always wishes for our welfare. He can never fight with his disciples. Similarly, how can Grandfather Bhishma not have heartfelt affection towards the Pandavas?॥ 15 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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