श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 144: विदुरकी बात सुनकर युद्धके भावी दुष्परिणामसे व्यथित हुई कुन्तीका बहुत सोच-विचारके बाद कर्णके पास जाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.144.1 
वैशम्पायन उवाच
असिद्धानुनये कृष्णे कुरुभ्य: पाण्डवान् गते।
अभिगम्य पृथां क्षत्ता शनै: शोचन्निवाब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! जब श्रीकृष्ण का अनुनय-विनय विफल हो गया और वे कौरवों को छोड़कर पाण्डवों के पास चले गए, तब विदुरजी कुन्ती के पास गए और मानो शोक से पीड़ित होकर धीरे-धीरे इस प्रकार बोले:॥1॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! When Shri Krishna's persuasion failed and he left the Kauravas and went to the Pandavas, then Vidur went to Kunti and, as if grief-stricken, spoke slowly as follows: ॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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