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श्लोक 5.14.17  |
एतेन चाहं सम्प्राप्ता द्रुतं शक्र तवान्तिकम्।
जहि रौद्रं महाबाहो नहुषं पापनिश्चयम्॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| हे महाबाहु इन्द्र! इसीलिए मैं बड़ी उतावली से आपके पास आया हूँ। आप उस पापमय विचार वाले भयंकर नहुष का वध कर दीजिए॥17॥ |
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| O mighty-armed Indra! That is why I have come to you in great haste. Please kill that terrible Nahusha who has sinful thoughts.॥ 17॥ |
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