श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 137: कुन्तीका पाण्डवोंके लिये संदेश देना और श्रीकृष्णका उनसे विदा लेकर उपप्लव्य नगरमें जाना  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  5.137.17-18 
न राज्यहरणं दु:खं द्यूते चापि पराजय:।
प्रव्राजनं सुतानां वा न मे तद् दु:खकारणम्॥ १७॥
यत्र सा बृहती श्यामा सभायां रुदती तदा।
अश्रौषीत् परुषा वाचस्तन्मे दु:खतरं महत्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! मुझे राज्य छिन जाने का उतना दुःख नहीं है। मुझे द्यूत-क्रीड़ा में हार जाने और अपने पुत्रों के वनवास जाने का उतना दुःख नहीं है, किन्तु मेरी सुंदर युवा पुत्रवधू द्रौपदी द्वारा सभा में रोते हुए सुने गए दुर्योधन के कठोर वचन मेरे लिए महान दुःख का कारण बन गए हैं।
 
Shri Krishna! I am not that sad about losing the kingdom. I am not that sad about losing the game of dice and my sons being sent to the forest, but the harsh words of Duryodhan heard by my beautiful young daughter-in-law Draupadi while she was crying in the court has become the cause of great sorrow for me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)