माद्रीपुत्रौ च वक्तव्यौ क्षत्रधर्मरतावुभौ।
विक्रमेणार्जितान् भोगान् वृणीतं जीवितादपि॥ १४॥
विक्रमाधिगता ह्यर्था: क्षत्रधर्मेण जीवत:।
मनो मनुष्यस्य सदा प्रीणन्ति पुरुषोत्तम॥ १५॥
अनुवाद
पुरुषोत्तम! तत्पश्चात् क्षत्रिय धर्म में तत्पर रहने वाले माद्री के दोनों पुत्रों को मेरा यह संदेश कहो - 'वीरों! प्राणों की बाजी लगाकर भी अपने पराक्रम से प्राप्त सुखों का भोग करो। क्षत्रिय धर्म का पालन करने वाले पुरुष का मन पराक्रम से प्राप्त पदार्थों से सदैव संतुष्ट रहता है।॥ 14-15॥
Purushottam! Thereafter convey this message of mine to both the sons of Madri who are devoted to Kshatriya Dharma – ‘Heroes! Even at the risk of your lives, enjoy the pleasures obtained by your valour. The mind of a man who follows Kshatriya Dharma is always satisfied with the things obtained by valour.॥ 14-15॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥