श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.133.6 
निर्मन्युश्चाप्यसंख्येय: पुरुष: क्लीबसाधन:।
यावज्जीवं निराशोऽसि कल्याणाय धुरं वह॥ ६॥
 
 
अनुवाद
तुम क्रोध से सर्वथा रहित हो और क्षत्रियों में गिने जाने योग्य नहीं हो। तुम नाममात्र के मनुष्य हो। तुम्हारे मन आदि सभी साधन नपुंसक के समान हैं। क्या तुम जीवन भर के लिए निराश हो? ओहो! अब भी उठो और अपने कल्याण के लिए पुनः युद्ध का भार उठाओ। 6॥
 
You are completely devoid of anger and are not worthy of being counted among the Kshatriyas. You are a nominal man. All your resources like your mind are like impotent ones. Are you disappointed for life? Oho! Even now, get up and bear the burden of war again for your welfare. 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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