श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  5.133.43 
यमाजीवन्ति पुरुषं सर्वभूतानि संजय।
पक्वं द्रुममिवासाद्य तस्य जीवितमर्थवत्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
संजय! पके हुए फल देने वाले वृक्ष की तरह उसी मनुष्य का जीवन सार्थक है जो वृक्ष का आश्रय लेता है और सभी प्राणी उसी से जीविका चलाते हैं ॥ 43॥
 
Sanjay! Like a tree bearing ripe fruits, only that person's life is meaningful who takes shelter in the tree and all living beings earn their livelihood. ॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)