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श्लोक 5.133.43  |
यमाजीवन्ति पुरुषं सर्वभूतानि संजय।
पक्वं द्रुममिवासाद्य तस्य जीवितमर्थवत्॥ ४३॥ |
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| अनुवाद |
| संजय! पके हुए फल देने वाले वृक्ष की तरह उसी मनुष्य का जीवन सार्थक है जो वृक्ष का आश्रय लेता है और सभी प्राणी उसी से जीविका चलाते हैं ॥ 43॥ |
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| Sanjay! Like a tree bearing ripe fruits, only that person's life is meaningful who takes shelter in the tree and all living beings earn their livelihood. ॥ 43॥ |
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