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mahabharat 5.133.34-35h: अपनी पराजय के कारण तुम लोगों द्वारा निन्दा और तिरस्कार का पात्र बन रहे हो; इन सब दोषों से मुक्त हो जाओ और अपने हृदय को लोहे के समान दृढ़ बनाओ और फिर अपने उचित पद (राजवैभव) की खोज करो।   |   mahabharat अध्याय 5.133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 34-35h
 
 
श्लोक  5.133.34-35h 
एभ्यो निकृतिपापेभ्य: प्रमुञ्चात्मानमात्मना॥ ३४॥
आयसं हृदयं कृत्वा मृगयस्व पुन: स्वकम्।
 
 
अनुवाद
अपनी पराजय के कारण तुम लोगों द्वारा निन्दा और तिरस्कार का पात्र बन रहे हो; इन सब दोषों से मुक्त हो जाओ और अपने हृदय को लोहे के समान दृढ़ बनाओ और फिर अपने उचित पद (राजवैभव) की खोज करो।
 
Due to your defeat, you are being criticized and despised by the people; free yourself from all these faults and make your heart as strong as iron and then search for your rightful position (royal glory) again. 34 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)